किन्नर समुदाय की बात आते ही उनके प्रति हमारे जहन में कुछ अलग ही प्रकार की सोच सामने आती है। क्योंकि किन्नरों का समाज हमारे समाज से बहुत अलग होता है। किन्नरों का रहन -सहन आम लोगो से अलग प्रकार का होता है इसी लिए शायद किन्नरों के बारे में जॉनने के लिए आम लोगो में इन्हे जॉनने की जिज्ञासा बनती जाती है किन्नरों का समुदाय कई ग्रंथों से चला आ रहा है। और आज भी इसका वर्णन किया जाता है।

किन्नर अगर किसी इंसान को कोई दुआ दे देता है, तो उनकी दुआ कभी भी खाली नही जाती। वह दुआ किसी भी व्यक्ति को बुरे समय को दूर करने में बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दुआ के नाम पर यदि यह किसी को सिक्का दे देते है, तो वह उस व्यक्ति को काफी धन लाभ होता है। इस तरह यदि किन्नर किसी शादी या किसी शुभ काम में पहुच जाए और वहा पर अपनी दुआएं दे दे तो वह काम बहुत शुभ माना जाता है।

किन्नरों का समुदाय समाज ऐसे लड़को की तलाश करता है। जो की देखने में सुंदर हो और उसके बोलने –चलने का तरीका कुछ अलग हो और ऐसे लडके उन्हें जब मिल जाते है। तो यह किन्नर उन लडको से आपनी नजदीकीया बढाना शुरू कर देते है और कुछ समय बाद लडको को अपनी और आकर्षित कर अपने साथ ले जाते है।

किन्नरों की शव यात्राएं रातं को 12 बजे निकाली जाती है। शव यात्रा को उठाने से पूर्व जूतों-चप्पलों से पीटा जाता है। किन्नर के मरने के बाद पूरा किन्नरों का समुदाय एक सप्ताह तक भूखा रहता है। किन्नरों का कहना है कि मरने के बाद यह मातम नहीं मनाते हैं। किन्नर समाज में मान्यता है कि मरने के बाद इस नर्क रूपी जीवन से छुटकारा मिल जाता है। इसीलिए मरने के बाद हम खुशी मनाते हैं । ये लोग स्वंय के पैसो से कई दान कार्य भी करवाते है ताकि पुन: उन्हें इस रूप में पैदा ना होना पड़े।

हमारे देश में हर साल किन्नरों की संख्या में 40-50 हजार की व्रद्धी होती जा रही है। देशभर के तमाम किन्नरों में से 90 फीसद ऐसे होते हैं जिन्हें बनाया जाता है। समय के साथ किन्नर बिरादरी में वो लोग भी शामिल होते चले गए जो जनाना भाव रखते हैं। 1871 से पहले तक भारत में किन्नरों को ट्रांसजेंडर का अधिकार मिला हुआ है।

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