स्वामी विवेकानन्द ने कहा की (धर्म) भारत की आत्मा है। जेसे धर्म अद्यतमिकता उसकी आत्मा है, उसका पुरत्थान भी धर्म से होना आवश्यक है। धर्म मे ही भारत की जान है ओर जब तक हिन्दू जाती अपने पूर्वजो की धरोहर को नहीं भूलती विश्व की कोई ताकत ऐसी नहीं है जो उसे खत्म कर सके। जब शरीर का खून शुद्ध ओर सशक्त रहता है , उस शरीर मे किसी रोग के किटाणु नहीं नहीं रह सकते। हमारे शरीर का खून अध्यात्म है। जब यह निबाध  गति से सशक्त, शुद्ध तथा जीवंत से प्र्वहित होता रहेगा, सब कुछ ठीक रहेगा, राजनीतिक, सामाजिक ओर दूसरे कई बड़े दोष, यहा तक की देश की दरिद्रता भी, सब ठीक हो जाएगा यदि रक्त शुद्ध है तो हमारी जाती का लक्ष कभी राजनीतिक महानता या सेन्य शक्ति नहीं रहा, वह भी काबी नहीं रहा ओर कभी नहीं रहेगा।

हम देखते भी है की भारतीय जाती कभी  संपदा जुटाने मे रत नहीं रही याध्पी हमने अपार समदा प्राप्त की इतनी समदा, जितनी कोई अन्य देश नहीं जुटापाया होगा, तथापि यह देश संपदा का पक्षधर नहीं रहा। यहा सदियो से एक सशक्त जाति रही, परंतु हम देखते है की यह देश कभी सता का पक्षधर नहीं रहा कभी दूसरे देशो को जीतने नहीं गया भारत को कभी साम्राराज्य की भूख नहीं रही। इस जाती के आदर्श सता ओर सम्पदा कभी नहीं रहे।

स्वामी विवेकानंद ने कहा की मेने थोड़ी सी दुनिया देखी है पूर्व पश्चिम की जातियो मे गया हु, सर्वत्र मेने पाया की हर देश का अपना-अपना आदर्श होता है , जो उसकी रीढ़ की हड्डी का काम करता है , उसे उस जाति की रीढ़ की हड्डी कहा जा सकता है किसी देश की रीढ़ राजनीति होती है किसी की सामाजिक संस्कर्ति किसी बोद्धिक संस्कर्ति इत्यादि होती है। परंतु हमारी भारत माता का आधार, उसकी रीढ़ की हड्डी , धर्म ओर केवल धर्म है, क्योकि इसी पहाड़ पर इसके सम्पूर्ण जीवन का विशाल प्रसाद खड़ा है

भारतीय जीवनशेली का यही तत्व है उसके, शाश्रत संगीत की यही धुन है उसकी रीढ़ हड्डी यही है, यही उसकी नीव है – अपने इस जीवन-मार्ग से वह कभी विचलित नहीं हुआ है शासन चाहे तातार का हो या तुकों  का, मुगल शासन करे या अग्रेज़।

 

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