सिंहस्थ कुम्भ महापर्व दौरान पवित्र स्नान का महत्व

33

सिंहस्थ कुम्भ महापर्व दौरान पवित्र स्नान का महत्व प्राचीन भारत में आध्यात्मिक सत्यों को सांकेतिक कथाओ के माध्यम से सुरक्षित रखा जाता था ताकि उनका उपयोग अधिकारी पुरुष के अलावा कोई ना करे। कालांतर में यही कथाएँ विभिन्न परम्पराओ की जनक सिद्ध हुई और हमारी रहस्यमयी, विविधरंगी संस्कृति ने आकार ग्रहण किया। इसलिए यह संभव नहीं था कि कुम्भ व सिंहस्थ कुम्भ महापर्व जैसे आयोजनों के पीछे कोई कथा न हो।

पुराणों में इसकी कथा है। चाहे आज इस कथा के पीछे के सत्य की कोई छाया भी हमारी जातीय स्मृति में शेष न हो, लेकिन कथा तो है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में हिमालय के समीप क्षीरोद नामक समुद्र तट पर देवताओं तथा दानवों ने एकत्र होकर फल प्राप्ति के लिए समुद्र-मंथन किया। फलस्वरूप जो 14 रत्न प्राप्त हुए उनमे श्री रम्भा, विष, वारुणी, अमिय, शंख। गजराज, धन्वन्तरि, धनु, तरु, चन्द्रमा, मणि और बाजि इनमें से अमृत का कुम्भ अर्थात घड़ा सबसे अंत में निकला।

उसकी अमर करने वाली शक्ति से देवताओं को यह चिंता हुई कि यदि दानवों ने इसका पान कर लिया तो दोनों में संघर्ष स्थायी हो जाएगा। इसलिए देवताओं ने इन्द्र के पुत्र जयंत को अमृत कलश को लेकर आकाश में उड़ जाने का संकेत किया। जयंत अतृत के कलश को लेकर आकाश में उड़ गया और दानव उसे छीनने के लिए उसके पीछे पड़ गये। इस प्रकार अमृत-कलश को लेकर देवताओं व दानवों में संघर्ष छिड़ गया।

दोनों पक्षों में 12 दिन तक संघर्ष चला। इस दौरान दानवों ने जयंत को पकड़कर अमृत कलश पर अधिकार करना चाहा। छीना-झपटी में कुम्भ से अमृत की बूंदें छलक कर जिन स्थानों पर गिरीं, वे हैं प्रयाग, हरि‍द्वार, नासिक तथा उज्जैन। इन चारों स्थानों पर जिस-जिस समय अमृत गिरा उस समय सूर्य, चन्द्र, गुरू आदि ग्रह-नक्षत्रों तथा अन्य योगों की स्थ‍िति भी उन्हीं स्थ‍ितियों के आने पर प्रत्येक स्थान पर यह कुम्भ पर्व मनाये जाने लगे।

source

Comments are closed.